
जब उठती है नही तमन्नाये
और दिल चाहता है उड़ जाने को
ये सोच कर की कही तोड़ ना दू समाज के इस पिंजरे को
मुझे अपने आप से डर लगता है
जब लक्ष्य ढूढने को उठते है कदम
और देखती हु बंदिशों में थमी जिंदगी को
ये सोच कर की कही छेद न दू द्वंद खुद में
मुझे अपने आप से डर लगता है
जब देखती हु अपने आप को
अपना अस्तित्व खोजते हुए
ये सोच कर की कही झुठला न दू खुद को
मुझे अपने आप से डर लगता है
जब याद आते है अनकहे अधूरे सपने
और उन्हें पूरा करने में असक्षम मैं
ये सोच कर की कही दफ़न न कर दू उन्हें अपने अन्दर
मुझे अपने आप से डर लगता है
श्वेता जी, मैं आपकी कविताओं और गज़लों का नियमित पाठक हूँ और इन्तेज़ार करता रहता हूँ कि कब आपका नया पोस्ट आएगा.
ReplyDeleteआज आपका नया पोस्ट देखकर बहुत खुशी हुयी. आपकी कविताओं में अपने अस्तित्व को लेकर जो दर्द रहता है,वह सबके दिल के दर्द को जुबान देता है.
इस कविता में आपने जिस द्वन्द और डर का जिक्र किया है, उसे हर संवेदनशील दिल महसूस करता है.
आपके अंदर अपना गहन अस्तित्वबोध है,जिसे बहुत कम लोग महसूस कर पाते हैं और जो महसूस करते हैं उन्हें वही डर और द्वन्द से जिंदगी भर जूझना पड़ता है.
मैं तो यही कहूँगा कि आप सारे डर त्याग करके अपनी आज़ादी का रास्ता अपनाइए.
नई पोस्ट का इन्तेज़ार रहेगा.
OCTOBER 20, 2010 9
श्वेता जी आपका ब्लॉग पहली बार पढ़ा। आपकी रचनाएं अति सुंदर हैं। दुआ है कि आप इसी तरह अपनी रचनाएं पाठकों तक पहुंचाती रहें।
ReplyDeleterajiv ji aapka bohot bohot dhanyawad....accha laga ki mere andar ke dhwand ko aap itni acchi tarah samajh paye... mere vichar me aapko meri kavita "hasrat" ( http://jindalshweta.blogspot.com/2010/08/blog-post.html )
ReplyDeletepadni chahiye shayad aapko pasand aayegi..
@jitendra ji : aapka swagat hai
क्या कहूँ भावनाओं के बारे में..अपने अंदर की चीजों को इतना आप कैसे समझ लेते हो...और समझने के अलावा उसे शब्दों में कैसे बाँध लेते हो...मेरे पास तो इतने शब्द नहीं की तारीफ़ सही तरीके से कर पाऊं...
ReplyDeleteजब लक्ष्य ढूढने को उठते है कदम
ReplyDeleteऔर देखती हूं बंदिशों में थमी जिंदगी को...
बहुत अच्छी प्रस्तुति...
हम सब कहीं न कहीं इसी स्थिति में होते हैं.
kavita kisi na kisi dwand ke bad hi upajti hai, sahmati
ReplyDeleteआपकी रचनाएं अति सुंदर हैं। धन्यवाद|
ReplyDeleteअंतर्द्वंद को उजागर करती प्रशंसनीय प्रस्तुति
ReplyDeleteहमारी तरफ से आपको बढ़िया लेखन के लिए बधाई .....
ReplyDeleteजब देखती हु अपने आप को
ReplyDeleteअपना अस्तित्व खोजते हुए
ये सोच कर की कही झुठला न दू खुद को
मुझे अपने आप से डर लगता
lovely lines .
.
श्वेता जी,
ReplyDeleteआज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ.......अच्छा लगा आपका ब्लॉग......भावनाओ को सही ढंग से शब्दों में पिरोया है आपने......पोस्ट के साथ लगी तस्वीर पोस्ट के साथ पूरी तरह से इन्साफ कर रह है.......आपकी पसंद अच्छी है......कुछ मात्रात्मक गलतियाँ मिली....हो सके तो सुधार करें.......इस उम्मीद में आपको फॉलो कर रहा हूँ की आगे भी ऐसे ही बढ़िया पड़ने को मिलेगा ...............शुभकामनायें|
कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
http://khaleelzibran.blogspot.com/
http://qalamkasipahi.blogspot.com/
एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|
bhut khoob shweta .
ReplyDeleteइस कृति की जितनी तारीफ़ की जाए कम है. साधुवाद.
ReplyDeleteनिरंतर लेखन हेतु शुभकामनाएं.
---
वात्स्यायन गली
jandar,shandar,damdar.narayan narayan
ReplyDeleteस्वेता जी, हमने अपने ब्लॉग के आपके इस कविता पर एक छोटा सा आलेख लिखा है,अगर आपको कोई आपत्ति हो तो हमें सूचित कीजियेगा.
ReplyDeleteआप क्या केवल नकारात्मक ही लिखती है.?
ReplyDeletehey waise to bahut sare logon ne taarif kar di hai teri but phir bhi yaar bahut acha likha hai keep it up waise jyada hawa me mat udna (just joking)
ReplyDeleteजब देखती हु अपने आप को
ReplyDeleteअपना अस्तित्व खोजते हुए
ये सोच कर की कही झुठला न दू खुद को
मुझे अपने आप से डर लगता है
...अपने अस्तित्व की खोज जिसे लगी , वह डरना भूल जाता है ...खुद को जुठलाने की न सोचे ...
सुंदर कविता !!!
इस नए सुंदर से ब्लॉग के साथ हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
ReplyDeleteशानदार प्रयास बधाई और शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteएक विचार : चाहे कोई माने या न माने, लेकिन हमारे विचार हर अच्छे और बुरे, प्रिय और अप्रिय के प्राथमिक कारण हैं!
-लेखक (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश') : समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान- (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जिसमें 05 अक्टूबर, 2010 तक, 4542 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता राजस्थान के सभी जिलों एवं दिल्ली सहित देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे), मो. नं. 098285-02666.
E-mail : dplmeena@gmail.com
E-mail : plseeim4u@gmail.com
seems u have written a few poems. was not checking for few days.
ReplyDeletegood thoughts
nice one..... :)
ReplyDelete