जिन्दगी को समझने में निकल रही है जिन्दगी
एक खाली किताब पढने में निकल रही है जिन्दगी
नक़ल हम भी बंदरो से कुछ कम नही करते
दुसरो के चोलो में निकल रही है जिन्दगी
जिन कहानियो में मेरा ज़िक्र तक नही है
उलझ कर उनमे निकल रही है जिंदगी
सुबह को शाम , शाम को सुबह का इंतज़ार करते है
ना जाने किस चाह में निकल रही है जिंदगी
जब सवाल नही उठा था तब खुश थे हम
पर अब एक सवाल बनके निकल रही है जिंदगी
Thursday, December 29, 2011
Tuesday, August 23, 2011
तेरे इश्क में........

ऐसी बारिश हुई मैं हरी हो गयी
अबतक तो थी मैं खोटी अब खरी हो गयी
अब तक तो तन ये लगता था बेमोल बस माटी सा
तुने छुआ तो सोने की मैं जरी हो गयी
सौतन सी कुछ लगी तुझे छु के गुजरती हवा
सब कहने लगे देखो ये बावरी हो गयी
इलज़ाम था की मुझमे प्रेमरस नही बहता
तुझे शिद्दत से यु चाहा की मैं बरी हो गयी
जोगन सी बेटी देख कर रोती है मेरी माँ
छोरी ये जन मुसीबत नरी हो गयी
Tuesday, August 16, 2011
in support of jan lokpal.......
Monday, February 14, 2011
प्रतिभा . . . . . . . .
एक दिन हवा का झौका
कुछ ऐसा संग-संग लाया
एक आँगन में तो एक छत की दिवार पे
पीपल का पेड़ उग आया
दोनों बड़े प्रगति के पथ
भर के बाजु में जोश अपार
एक में चीरा सीना धरती का
दूजे ने बेध डाली दिवार
पहले के देख हुए सब कुछ
माँ में सीचा पूजा भी की
दूजे को देख कर क्रोध जगा
काट फेक फिर तृप्ति की
प्रतिभा उगती पड़ो सी यहाँ
कुछ बढती कुछ कट जाती है
दीवारे है जिनकी किस्मत में
ठुन्ठो सी छटपटाती है
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